वाल्मीकि रामायण 2.3.42
गुणवत्यपि तु स्नेहात्पुत्र वक्ष्यामि ते हितम् ।भूयो विनयमास्थाय भव नित्यं जितेन्द्रियः॥
guṇavatyapi tu snehātputra vakṣyāmi te hitam |bhūyo vinayamāsthāya bhava nityaṃ jitendriyaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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