वाल्मीकि रामायण 2.35.26
स तच्छ्रुत्वा वचस्तस्य प्रसन्नमनसो नृपः ।मातरम् ते निरस्याशु विजहार कुबेरवत्॥
sa tacchrutvā vacastasya prasannamanaso nṛpaḥ |mātaram te nirasyāśu vijahāra kuberavat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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