वाल्मीकि रामायण 2.36.2
सूत रत्न सुसम्पूर्णा चतुर् विध बला चमूः ।रागवस्य अनुयात्रा अर्थम् क्षिप्रम् प्रतिविधीयताम्॥
sūta ratna susampūrṇā catur vidha balā camūḥ |rāgavasya anuyātrā artham kṣipram pratividhīyatām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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