वाल्मीकि रामायण 2.37.35
एकस्य रामस्य वने निवास ।स्त्वया वृतह् केकयराजपुत्रि ।विभूषितेयम् प्रतिकर्मनित्या ।वसत्वरण्ये सह राघवेण॥
ekasya rāmasya vane nivāsa |stvayā vṛtah kekayarājaputri |vibhūṣiteyam pratikarmanityā |vasatvaraṇye saha rāghaveṇa ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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