वाल्मीकि रामायण 2.37.6
अथ चीराणि कैकेयी स्वयम् आहृत्य राघवम् ।उवाच परिधत्स्व इति जन ओघे निरपत्रपा॥
atha cīrāṇi kaikeyī svayam āhṛtya rāghavam |uvāca paridhatsva iti jana oghe nirapatrapā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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