वाल्मीकि रामायण 2.4.11
प्रणमन्तं समुत्थाप्य तं परिष्वज्य भूमिपः ।प्रदिश्य चास्मै रुचिरमासनं पुनरब्रवीत्॥
praṇamantaṃ samutthāpya taṃ pariṣvajya bhūmipaḥ |pradiśya cāsmai ruciramāsanaṃ punarabravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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