वाल्मीकि रामायण 2.4.42
इत्येवमुक्तो मात्रेदं रामो भ्रातरमब्रवीत् ।प्राञ्जलिं प्रह्वमासीनमभिवीख्स्य स्मयन्निव॥
ityevamukto mātredaṃ rāmo bhrātaramabravīt |prāñjaliṃ prahvamāsīnamabhivīkhsya smayanniva ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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