वाल्मीकि रामायण 2.42.34
तम् रामम् एव अनुविचिन्तयन्तम् ।समीक्ष्य देवी शयने नर इन्द्रम् ।उप उपविश्य अधिकम् आर्त रूपाउप ।विनिह्श्वसन्ती विललाप कृच्च्रम्॥
tam rāmam eva anuvicintayantam |samīkṣya devī śayane nara indram |upa upaviśya adhikam ārta rūpāupa |vinihśvasantī vilalāpa kṛccram ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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