वाल्मीकि रामायण 2.44.23
पुनः प्रविष्टम् द्R^ष्ट्वा तमभिषिक्तम् महाश्रियम् ।समुत्स्रक्ष्यसि नेत्राभ्याम् क्षिप्रमान्न्दजम् पयः॥
punaḥ praviṣṭam dR^ṣṭvā tamabhiṣiktam mahāśriyam |samutsrakṣyasi netrābhyām kṣipramānndajam payaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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