वाल्मीकि रामायण 2.51.19
अतिक्रान्तम् अतिक्रान्तम् अनवाप्य मनोरथम् ।राज्ये रामम् अनिक्षिप्य पिता मे विनशिष्यति॥
atikrāntam atikrāntam anavāpya manoratham |rājye rāmam anikṣipya pitā me vinaśiṣyati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें