वाल्मीकि रामायण 2.52.68
जटाः कृत्वा गमिष्यामि न्यग्रोध क्षीरम् आनय ।तत् क्षीरम् राज पुत्राय गुहः क्षिप्रम् उपाहरत्॥
jaṭāḥ kṛtvā gamiṣyāmi nyagrodha kṣīram ānaya |tat kṣīram rāja putrāya guhaḥ kṣipram upāharat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें