वाल्मीकि रामायण 2.54.35
सीतातृतीय काकुत्स्थह् परिश्रान्तः सुखोचितः ।भरद्वाजाश्रमे रम्ये ताम् रात्रि मवस्त्सुखम्॥
sītātṛtīya kākutsthah pariśrāntaḥ sukhocitaḥ |bharadvājāśrame ramye tām rātri mavastsukham ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें