वाल्मीकि रामायण 2.54.42
विचरन्ति वन अन्तेषु तानि द्रक्ष्यसि राघव ।सरित्प्रस्रवणप्रस्थान् दरीकन्धरनिर्घरान्॥
vicaranti vana anteṣu tāni drakṣyasi rāghava |saritprasravaṇaprasthān darīkandharanirgharān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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