वाल्मीकि रामायण 2.60.8
न अस्या दैन्यम् कृतम् किम्चित् सुसूक्ष्मम् अपि लक्षये ।उचिता इव प्रवासानाम् वैदेही प्रतिभाति मा॥
na asyā dainyam kṛtam kimcit susūkṣmam api lakṣaye |ucitā iva pravāsānām vaidehī pratibhāti mā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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