वाल्मीकि रामायण 2.63.17
क्लिन्नपक्षोत्तराः स्नाताः कृच्च्रादिव वतत्रिणः ।वृष्टिवातावधूताग्रान् पादपानभिपेदिरे॥
klinnapakṣottarāḥ snātāḥ kṛccrādiva vatatriṇaḥ |vṛṣṭivātāvadhūtāgrān pādapānabhipedire ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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