वाल्मीकि रामायण 2.63.27
तत्र वाग् उषसि व्यक्ता प्रादुर् आसीद् वन ओकसः ।हा हा इति पततः तोये बाणाभिहतमर्मणः॥
tatra vāg uṣasi vyaktā prādur āsīd vana okasaḥ |hā hā iti patataḥ toye bāṇābhihatamarmaṇaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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