वाल्मीकि रामायण 2.64.16
गत्वा नद्याः ततः तीरम् अपश्यम् इषुणा हृदि ।विनिर्भिन्नम् गत प्राणम् शयानम् भुवि तापसम्॥
gatvā nadyāḥ tataḥ tīram apaśyam iṣuṇā hṛdi |vinirbhinnam gata prāṇam śayānam bhuvi tāpasam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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