वाल्मीकि रामायण 2.65.3
राजानम् स्तुताम् तेषामुदात्ताभिहिताशिषाम् ।प्रासादाभोगविस्तीर्णः स्तुतिशब्दो ह्यवर्तत॥
rājānam stutām teṣāmudāttābhihitāśiṣām |prāsādābhogavistīrṇaḥ stutiśabdo hyavartata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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