वाल्मीकि रामायण 2.7.7
प्रहर्षोत्फुल्लनयनां पाण्डुरक्षौमवासिनीम् ।अविदूरे स्थितां दृष्ट्वा धात्रीं पप्रच्छ मन्थरा॥
praharṣotphullanayanāṃ pāṇḍurakṣaumavāsinīm |avidūre sthitāṃ dṛṣṭvā dhātrīṃ papraccha mantharā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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