वाल्मीकि रामायण 2.71.4
सत्य सम्धः शुचिः श्रीमान् प्रेक्षमाणः शिला वहाम् ।अत्ययात् स महा शैलान् वनम् चैत्र रथम् प्रति॥
satya samdhaḥ śuciḥ śrīmān prekṣamāṇaḥ śilā vahām |atyayāt sa mahā śailān vanam caitra ratham prati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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