वाल्मीकि रामायण 2.73.4
कुलस्य त्वम् अभावाय काल रात्रिर् इव आगता ।अन्गारम् उपगूह्य स्म पिता मे न अवबुद्धवान्॥
kulasya tvam abhāvāya kāla rātrir iva āgatā |angāram upagūhya sma pitā me na avabuddhavān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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