वाल्मीकि रामायण 2.75.26
सम्श्रुत्य च तपस्विभ्यः सत्रे वै यज्ञ दक्षिणाम् ।ताम् विप्रलपताम् पापम् यस्य आर्यो अनुमते गतः॥
samśrutya ca tapasvibhyaḥ satre vai yajña dakṣiṇām |tām vipralapatām pāpam yasya āryo anumate gataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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