वाल्मीकि रामायण 2.75.48
अपास्य मातृशुश्रूषामनर्थे सोऽवतिष्ठताम् ।दीर्घबाहुर्महावक्षा यस्यार्योऽसुमते गतः॥
apāsya mātṛśuśrūṣāmanarthe so'vatiṣṭhatām |dīrghabāhurmahāvakṣā yasyāryo'sumate gataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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