वाल्मीकि रामायण 2.76.1
तम् एवम् शोक सम्तप्तम् भरतम् केकयी सुतम् ।उवाच वदताम् श्रेष्ठो वसिष्ठः श्रेष्ठ वाग् ऋषिः॥
tam evam śoka samtaptam bharatam kekayī sutam |uvāca vadatām śreṣṭho vasiṣṭhaḥ śreṣṭha vāg ṛṣiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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