वाल्मीकि रामायण 2.76.6
किम् ते व्यवसितम् राजन् प्रोषिते मय्य् अनागते ।विवास्य रामम् धर्मज्ञम् लक्ष्मणम् च महा बलम्॥
kim te vyavasitam rājan proṣite mayy anāgate |vivāsya rāmam dharmajñam lakṣmaṇam ca mahā balam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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