वाल्मीकि रामायण 2.77.1
ततः दश अहे अतिगते कृत शौचो नृप आत्मजः ।द्वादशे अहनि सम्प्राप्ते श्राद्ध कर्माणि अकारयत्॥
tataḥ daśa ahe atigate kṛta śauco nṛpa ātmajaḥ |dvādaśe ahani samprāpte śrāddha karmāṇi akārayat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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