वाल्मीकि रामायण 2.8.3
मनसा प्रहसामि त्वां देवि दुःखार्धिता सती ।यच्छोचितव्ये हृष्टासि प्राप्येदं व्यसनं महत्॥
manasā prahasāmi tvāṃ devi duḥkhārdhitā satī |yacchocitavye hṛṣṭāsi prāpyedaṃ vyasanaṃ mahat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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