वाल्मीकि रामायण 2.8.4
शोचामि दुर्मतित्वं ते का हि प्राज्ञा प्रहर्षयेत् ।अरेः सपत्नीपुत्रस्य वृद्धिं मृत्युमिवागताम्॥
śocāmi durmatitvaṃ te kā hi prājñā praharṣayet |areḥ sapatnīputrasya vṛddhiṃ mṛtyumivāgatām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें