वाल्मीकि रामायण 2.85.3
इति उक्त्वा तु महा तेजा गुहम् वचनम् उत्तमम् ।अब्रवीद् भरतः श्रीमान् निषाद अधिपतिम् पुनः॥
iti uktvā tu mahā tejā guham vacanam uttamam |abravīd bharataḥ śrīmān niṣāda adhipatim punaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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