वाल्मीकि रामायण 2.87.16
तत् सर्वम् प्रत्यनुज्नासीद् रामः सत्य पराक्रमः ।न हि तत् प्रत्यगृह्णात् स क्षत्र धर्मम् अनुस्मरन्॥
tat sarvam pratyanujnāsīd rāmaḥ satya parākramaḥ |na hi tat pratyagṛhṇāt sa kṣatra dharmam anusmaran ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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