वाल्मीकि रामायण 2.89.3
जागर्मि नाहं स्वपिमि तमेवार्य्यं विचिन्तयन् ।इत्येवमब्रवीद्भ्रात्रा शत्रुघ्नोपि प्रचोदित:॥
jāgarmi nāhaṃ svapimi tamevāryyaṃ vicintayan |ityevamabravīdbhrātrā śatrughnopi pracodita: ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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