वाल्मीकि रामायण 2.93.6
स यात्वा दूरमध्वानं सुपरिश्रान्तवाहन: ।उवाच भरत: श्रीमान् वसिष्ठं मन्त्रिणां वरम्॥
sa yātvā dūramadhvānaṃ supariśrāntavāhana: |uvāca bharata: śrīmān vasiṣṭhaṃ mantriṇāṃ varam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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