वाल्मीकि रामायण 2.94.1
दीर्घकालोषितस्तस्मिन् गिरौ गिरिवनप्रिय: ।वैदेह्या: प्रियमाकांक्षन् स्वं च चित्तं विलोभयन्॥
dīrghakāloṣitastasmin girau girivanapriya: |vaidehyā: priyamākāṃkṣan svaṃ ca cittaṃ vilobhayan ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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