वाल्मीकि रामायण 3.15.4
रमते यत्र वैदेही त्वम् अहम् चैव लक्ष्मण ।तादृशो दृश्यताम् देशः संनिकृष्ट जलाशयः॥
ramate yatra vaidehī tvam aham caiva lakṣmaṇa |tādṛśo dṛśyatām deśaḥ saṃnikṛṣṭa jalāśayaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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