वाल्मीकि रामायण 3.15.7
परवान् अस्मि काकुत्स्थ त्वयि वर्ष शतम् स्थिते ।स्वयम् तु रुचिरे देशे क्रियताम् इति माम् वद॥
paravān asmi kākutstha tvayi varṣa śatam sthite |svayam tu rucire deśe kriyatām iti mām vada ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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