वाल्मीकि रामायण 3.2.1
कृत आतिथ्योऽथ रामस्तु सूर्यस्य उदयनम् प्रति ।आमंत्र्य स मुनीम् तत् सर्वान् वनम् एव अन्वगाहत॥
kṛta ātithyo'tha rāmastu sūryasya udayanam prati |āmaṃtrya sa munīm tat sarvān vanam eva anvagāhata ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें