वाल्मीकि रामायण 3.3.3
क्षत्रियौ वृत्त संपन्नौ विद्धि नौ वनगोचरौ ।त्वाम् तु वेदितुम् इच्छावः कः त्वम् चरसि दण्डकान्॥
kṣatriyau vṛtta saṃpannau viddhi nau vanagocarau |tvām tu veditum icchāvaḥ kaḥ tvam carasi daṇḍakān ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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