वाल्मीकि रामायण 3.33.3
सक्तम् ग्राम्येषु भोगेषु काम वृत्तम् महीपतिम् ।लुब्धम् न बहु मन्यन्ते श्मशान अग्निम् इव प्रजाः॥
saktam grāmyeṣu bhogeṣu kāma vṛttam mahīpatim |lubdham na bahu manyante śmaśāna agnim iva prajāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें