वाल्मीकि रामायण 3.33.7
आत्मवद्भिः विगृह्य त्वम् देव गंधर्व दानवैः ।अयुक्त चारः चपलः कथम् राजा भविष्यसि॥
ātmavadbhiḥ vigṛhya tvam deva gaṃdharva dānavaiḥ |ayukta cāraḥ capalaḥ katham rājā bhaviṣyasi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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