वाल्मीकि रामायण 3.37.15
शर अर्चिषम् अनाधृष्यम् चाप खड्ग इन्धनम् रणे ।राम अग्निम् सहसा दीप्तम् न प्रवेष्टुम् त्वम् अर्हसि॥
śara arciṣam anādhṛṣyam cāpa khaḍga indhanam raṇe |rāma agnim sahasā dīptam na praveṣṭum tvam arhasi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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