वाल्मीकि रामायण 3.42.32
कुसुमानि अपचिन्वन्ती चचार रुचिरानना ।अनर्हा अरण्य वासस्य सा तम् रत्नमयम् मृगम्॥
kusumāni apacinvantī cacāra rucirānanā |anarhā araṇya vāsasya sā tam ratnamayam mṛgam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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