वाल्मीकि रामायण 3.44.6
शंकितम् तु समुद् भ्रान्तम् उत्पतन्तम् इव अंबरे ।दृअश्यमानम् अदृश्यम् च वन उद्देशेषु केषुचित्॥
śaṃkitam tu samud bhrāntam utpatantam iva aṃbare |dṛaśyamānam adṛśyam ca vana uddeśeṣu keṣucit ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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