वाल्मीकि रामायण 3.50.17
सर्पम् आशीविषम् बद्ध्वा वस्त्र अन्ते न अवबुध्यसे ।ग्रीवायाम् प्रतिमुक्तम् च काल पाशम् न पश्यसि॥
sarpam āśīviṣam baddhvā vastra ante na avabudhyase |grīvāyām pratimuktam ca kāla pāśam na paśyasi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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