वाल्मीकि रामायण 3.67.2
स निगृह्य महाबाहुः प्रवृद्धम् रोषम् आत्मनः ।अवष्टभ्य धनुः चित्रम् रामो लक्ष्मणम् अब्रवीत्॥
sa nigṛhya mahābāhuḥ pravṛddham roṣam ātmanaḥ |avaṣṭabhya dhanuḥ citram rāmo lakṣmaṇam abravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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