वाल्मीकि रामायण 3.67.5
राक्षसैः बहुभिः कीर्णम् नाना द्रुम लता आयुतम् ।सन्ति इह गिरि दुर्गाणि निर्दराः कंदराणि च॥
rākṣasaiḥ bahubhiḥ kīrṇam nānā druma latā āyutam |santi iha giri durgāṇi nirdarāḥ kaṃdarāṇi ca ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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