वाल्मीकि रामायण 3.68.14
न च त्वया व्यथा कार्या जनकस्य सुताम् प्रति ।वैदेह्या रंस्यसे क्षिप्रम् हत्वा तम् रणमूर्धनि॥
na ca tvayā vyathā kāryā janakasya sutām prati |vaidehyā raṃsyase kṣipram hatvā tam raṇamūrdhani ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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