वाल्मीकि रामायण 3.69.2
ताम् दिशम् दक्षिणाम् गत्वा शर चाप असि धारिणौ ।अविप्रहतम् ऐक्ष्वाकौ पन्थानम् प्रतिपेदतुः॥
tām diśam dakṣiṇām gatvā śara cāpa asi dhāriṇau |aviprahatam aikṣvākau panthānam pratipedatuḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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