वाल्मीकि रामायण 3.70.17
एवम् उक्तः कबंधः तु लक्ष्मणेन उत्तरम् वचः ।उवाच परम प्रीतः तत् इन्द्र वचनम् स्मरन्॥
evam uktaḥ kabaṃdhaḥ tu lakṣmaṇena uttaram vacaḥ |uvāca parama prītaḥ tat indra vacanam smaran ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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