वाल्मीकि रामायण 3.71.30
विज्ञानम् हि महत् भ्रष्टम् शाप दोषेण राघव ।स्वकृतेन मया प्राप्तम् रूपम् लोक विगर्हितम्॥
vijñānam hi mahat bhraṣṭam śāpa doṣeṇa rāghava |svakṛtena mayā prāptam rūpam loka vigarhitam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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