वाल्मीकि रामायण 3.73.6
फलानि अमृत कल्पानि भक्षयित्वा गमिष्यथः ।तत् अतिक्रम्य काकुत्स्थ वनम् पुषित पादपम्॥
phalāni amṛta kalpāni bhakṣayitvā gamiṣyathaḥ |tat atikramya kākutstha vanam puṣita pādapam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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